why bhagoria utsav celebrated: Bhagoria Utsav Kyon Manate Hain : know everything about bhagoria utsav when and why bhagoria festival is celebrated by tribal : भगोरिया उत्सव कब, क्यों और कैसे मनाया जाता है, जानें सब कुछ

0
20


अलीराजपुर : एमपी के आदिवासी बाहुल्य इलाकों में भगोरिया की धूम है। जगह-जगह पर भगोरिया मेला लगा हुआ है। भगोरिया मेले में आदिवासी लोकसंस्कृति के रंग चरम पर नजर आते हैं। पर्व की तारीखों की घोषणा के साथ ही जगह-जगह पर भगोरिया हाट को लेकर तैयारियां शुरू हो जाती है। इन मेलों में आदिवासी संस्कृति और आधुनिकता की झलक देखने को मिलती है। कहा जाता है कि आदिवासियों के जीवन में यह उल्लास का पर्व है। भगोरिया उत्सव के लिए बाहर से आदिवासी अपने घर आते हैं।

होली के सात दिन पहले मनाए जाने वाले इस उत्सव में आदिवासी समाज डूबा रहता है। इन सात दिनों के दौरान आदिवासी समाज के लोग खुलकर अपनी जिंदगी जीते हैं। कहा जाता है कि देश के किसी भी कोने में काम के लिए गए आदिवासी, भगोरिया पर अपने गांव लौट आता है। घर पहुंचने के बाद ये लोग हर दिन परिवार के साथ भगोरिया मेले में जाते हैं। मेले का नजारा खूबसूरत होता है। पूरे दिन भगोरिया मेलों में रंगारंग कार्यक्रम आयोजित होते हैं। इसलिए भगोरिया को उल्लास का पर्व भी कहा जाता है। आदिवासी समाज के लोग सात दिनों तक अपनी जिंदगी अपने अंदाज में जीते हैं।

क्यों मनाया जाता है भगोरिया
मान्यता के अनुसार भगोरिया की शुरुआत राजा भोज के समय से हुई थी। उस समय दो भील राजाओं कासूमरा और बालून ने अपनी राजधानी में भगोर मेले का आयोजन शुरू किया था। इसके बाद दूसरे भील राजाओं ने भी अपने क्षेत्रों में इसका अनुसरण शुरू कर दिया। उस समय इसे भगोर कहा जाता था। वहीं, स्थानीय हाट और मेलों में लोग इसे भगोरिया कहने लगे। इसके बाद से ही आदिवासी बाहुल्य इलाकों में भगोरिया उत्सव मनाया जा रहा है।

शर्मनाक! मेला देखने गई लड़कियों के साथ दिनदहाड़े बदसलूकी, वीडियो बनाते रहे, देखते रहे लोग
नाचते-गाते उत्सव मनाते हैं आदिवासी

भगोरिया मेलों में आदिवासी संस्कृति की झलक देखने को मिलती है। आदिवासी लोगों की अलग-अलग टोलियां मेले में बांसुरी, ढोल और मांदल बजाते नजर आते हैं। इस दौरान आदिवासी लड़कियां भी मेले में सजधज कर आती हैं। वह पूरी तरह से पारंपरिक वेश-भूषा में होती हैं। साथ ही मेले में हाथों पर टैटू गुदवाती हैं।

bhagoria news

मेले में खाने के लिए अलग-अलग चीजें
वहीं, भगोरिया मेले के दौरान खाने के लिए भी अलग-अलग चीजें मिलती हैं। विशेष रूप से गुड़ की जलेबी, भजिया, पान और ताड़ी की डिमांड ज्यादा होती है। मेले में आए लोग अलग-अलग आदिवासी व्यंजनों का लुत्फ उठाते हैं।

रिश्ते भी होते हैं तय
भगोरिया मेले में आदिवासी युवक और युवतियों के रिश्ते भी तय होते हैं। मेले में आदिवासी युवतियां पारंपरिक वेश-भूषा में आती हैं। इसके साथ ही वह नृत्य भी प्रस्तुत करती हैं। परिवारों की सहमति से भगोरिया मेले में आदिवासी युवक और युवतियों के रिश्ते भी तय होते हैं। कहा जाता है कि इस मेले में युवतियां अपनी पसंद से लड़कों का चुनाव करती हैं। इसके बाद परिवार के लोग उसी के साथ शादी कराते हैं।

shivraj in bhagoria utsav

पान के जरिए होता है प्यार का इजहार
भगोरिया मेले में युवक-युवतियां अपने जीवनसाथी को भी ढूंढने आते हैं। एक-दूसरे को पसंद हैं या नहीं, इसका तरीका भी बहुत निराला है। अगर किसी लड़के को कोई लड़की पसंद आ जाए तो वह उसे पान खाने के लिए देता है। अगर लड़की पान खा लेती है तो इसे हां समझी जाती है। इसके बाद लड़का भगोरिया मेले से लड़की को लेकर निकल जाता है और दोनों शादी कर लेते हैं।

इसके साथ ही भगोरिया मेले को लेकर एक और कहानी प्रचलित है। अगर लड़का और लड़की एक-दूसरे के गाल गुलाबी रंग लगा दें तो इसे भी प्यार का इजहार समझा जाता है। हालांकि बदलते वक्त के साथ भगोरिया मेले का रिवाज भी बदल रहा है। अब मेले पर आधुनिकता ज्यादा हावी हो रहा है।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here